"कोई करेगा… या मैं शुरू करूँ?"

“जिस दिन इंसान अपनी ज़िंदगी की झाड़ू किसी और के हाथ में दे देता है, उसी दिन उसकी प्रगति रुकने लगती है।”

5/17/20261 min read

रमेश की नौकरी मुंबई की एक अच्छी फर्म में लग गई थी। उसने एक छोटे से एक कमरे का मकान भी ले लिया था। ज़िंदगी भागदौड़ से भरी थी। सुबह उठता, जल्दी-जल्दी खाना बनाता, तैयार होता और दो घंटे का सफ़र तय करके ऑफिस पहुँचता। दिन भर काम करता और रात को लौटकर थककर सो जाता।

लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ वह रोज़ नोटिस करता था—उसके घर के गेट के बिल्कुल बगल में कचरे का एक बड़ा ढेर पड़ा था। हर सुबह घर से निकलते समय वह नाक सिकोड़ता और मन ही मन कहता,
“कोई इसे साफ़ क्यों नहीं करता?”
और फिर अपने काम पर निकल जाता।

महीनों से नहीं, सालों से वह उस कचरे के ढेर को देख रहा था। उसके मन में हमेशा एक ही विचार आता—
“कोई आएगा… नगरपालिका आएगी… सरकार आएगी… कोई न कोई इसे साफ़ कर देगा।”

इंतज़ार करते-करते मौसम बदल गए, लेकिन कचरा वहीं रहा।

दिन बीतते गए, हफ्ते बीतते गए, और कचरा बढ़ता गया।

रमेश के पास समाधान भी था। वह जानता था कि यह साफ़ किया जा सकता है। वह यह भी जानता था कि अगर मोहल्ले के दो-चार लोगों को साथ बुला ले, थोड़ा समय निकाल ले, तो जगह साफ़ हो सकती है। लेकिन हर बार उसके मन में वही आवाज़ें उठतीं—

“अभी नहीं… कल देखेंगे…”
“मैं अकेला क्यों करूँ?”
“इतना भी क्या फर्क पड़ता है?”
“लोग साथ आएँगे भी?”
“मैं अकेला शुरू करूँगा तो लोग मुझे पागल समझेंगे…”

धीरे-धीरे एक अजीब बात हुई। रोज़ उस कचरे को देखते-देखते उसे उसकी आदत हो गई। अब उसे बदबू भी कम महसूस होने लगी थी। कचरा उसकी आँखों के सामने था, लेकिन उसकी चेतना से गायब हो चुका था।

एक दिन उसके गाँव के एक बुज़ुर्ग उससे मिलने आए। उन्होंने पूछा,
“बेटा, यह कचरा यहाँ कब से पड़ा है?”

रमेश बोला,
“बहुत समय से… हटाया तो जा सकता है, लेकिन पता नहीं क्यों हट नहीं रहा।”

बुज़ुर्ग मुस्कुराए और बोले—

“जिस दिन इंसान अपनी ज़िंदगी की झाड़ू किसी और के हाथ में दे देता है, उसी दिन उसकी प्रगति रुकने लगती है।”

फिर उन्होंने कहा—

“सरकार रास्ता बना सकती है, लेकिन चलना तुम्हें पड़ेगा।
कोई अवसर दे सकता है, लेकिन मेहनत तुम्हें करनी पड़ेगी।
कोई प्रेरणा दे सकता है, लेकिन पहला कदम तुम्हें उठाना पड़ेगा।”

उस दिन रमेश समझ गया—

इंतज़ार कभी-कभी कचरे से भी ज़्यादा खतरनाक होता है।
क्योंकि कचरा सिर्फ जगह घेरता है,
लेकिन इंतज़ार इंसान की क्षमता घेर लेता है।

अगली सुबह उसने झाड़ू उठाई। अकेले शुरुआत की। थोड़ी देर बाद पड़ोसी भी जुड़ गए। कुछ घंटों में वह जगह साफ़ थी।

शाम को साफ़ जगह को देखते हुए रमेश मुस्कुराया। अब उसे समझ आ गया था—

समस्या कचरा नहीं था। समस्या यह थी कि उसने शुरुआत नहीं की थी।

जीवन में भी हम अपने डर, भ्रम, टालमटोल और अधूरे फैसलों का कचरा सालों तक ढोते रहते हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें साफ़ नहीं किया जा सकता, बल्कि इसलिए कि हम पहला कदम नहीं उठाते।

याद रखिए—

कचरा जितना बाहर नहीं रोकता, उससे कहीं ज़्यादा “कल करेंगे”, “मुझे क्या मतलब”, “बाक़ी लोग भी तो हैं”, “सरकार का काम है” जैसी सोच रोकती है।

कचरा कोई भी हो—स्कूलों की बढ़ती फीस, किसी महिला के साथ हो रही बदसलूकी, भ्रष्टाचार, अन्याय, या किसी भूखे इंसान की मदद—जहाँ तक आपका हाथ पहुँचता है, वहाँ से शुरुआत कीजिए।

क्योंकि बदलाव हमेशा “कोई करेगा” से नहीं, “मैं शुरू करता हूँ” से शुरू होता है।

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